शुक्रवार, 29 मार्च 2024

जिन दिनों हम हिंदी फिल्मी ट्रेलरों पर ही फिदा थे ....


पिछली सदी का साठ, सत्तर, अस्सी का दशक भी हिंदी फिल्मों के नज़रिए से कमाल का था ....सब कुछ बा-कमाल का था....उस दौर की फिल्मों ने देश समाज को क्या दिया....इस पर बहुत सी पोथियां लिखी जा चुकी हैं....मेैं इस बारे में कुछ भारी भरकम लिखने के मूड में नहीं हूं....हां, भारी भरकम लिखने के लिए किसी विषय का ज्ञान भी तो उसी स्तर का चाहिए, मैं ठहरा हल्की फुल्की बातें में ही खुशी तलाशने वाला ....जो लोग सीरियस थोबडे़वाले बहुत ज्ञान बांटते हैं, मुझे उन से बहुत डर लगता है ....उन को देख कर हमेशा ऐसा क्यों लगता है जैसे वो किसी मैय्यत में आए हुए हैं....

खैर, चलिए...बात करते हैं ...आज से चालीस पचास साल पहले फिल्मी ट्रेलरों की ....मुझे बहुत याद आते हैं वे दिन जब हम लोग अपने दौर में फिल्मी ट्रेलर ज़रूर देखा करते थे ....ट्रेलर से आप समझ रहे होंगे वह विज्ञापन जो हम किसी फिल्म की मशहूरी की एक क्लिप देखते हैं जब हम लोग कोई और फिल्म देखने जाते हैं....मुझे अच्छे से याद नहीं है कि इस तरह के ट्रेलर फिल्म देखते वक्त जो हम लोग सिनेमा हाल में देखते थे, ये हम लोग कब से देखने लगे थे ....बिल्कुल याद नहीं ...

लेकिन मैं जिन फिल्मी ट्रेलरों की बात आज करूंगा वे तो कुछ अलग ही मुद्दा है ....मुझे नहीं पता कि उन को ट्रेलर कह भी सकते हैं या नहीं ...लेकिन हम तो स्कूल कालेज के दिनों में उन को ट्रेलर ही कहते थे .....और बाकायदा जब कोई फिल्म देख कर आते थे तो अगले कईं दिनों तक उस फिल्म की चर्चा के साथ साथ सिनेमा हाल के बाहर-अंदर लगे उन ट्रेलरों की बातें भी यारों दोस्तों के साथ होती थीं ...

जिन ट्रेलरों की मैं बात कर रहा हूं वे फिल्मों के कुछ दृश्य की तस्वीरें हुआ करती थीं जो हाल के बाहर और अंदर किसी कांच के फ्रेम के अंदर अच्छे से लगी रहती थीं ...उन को निहारना ही बड़ा रोमांचक था ....भगवान का शुक्रिया है तब तक ये मोबाइल-वाईल न थे, इसलिए हम लोग उन को इतने अच्छे से देख कर, निहार कर जैसे अपने दिलों में सेव कर लेते थे ....😎

किसी थियेटर में फिल्म लगने से पहले .....

जैसे ही हमें स्कूल आते जाते दीवारों पर लगे पोस्टरों से पता लगता था कि फलां फलां सिनेमा हाल में फलां तारीख से कोई फिल्म लग रही है तो हम अकसर स्कूल से लौटने का अपना रूट बदल लेते थे, साईकिल उस हाल की तरफ़ मोड़ लेते कि वहां जा कर कुछ और जानकारी हासिल होगी ...शायद बड़ा पोस्टर ही लग गया हो, अगर वह लग चुका होता तो उसे अच्छे से देखते ....एक एक किरदार को पहचानते या पहचानने की कोशिश करते... 


इस के बाद हम लोग साईकिल को किसी दीवार के किनारे टिका कर थोड़ा आगे बढ़ते और सिनेमा हाल के बाहर लगे ट्रेलर देखने की कोशिश करते ....जहां तक मुझे याद है उन दिनों हाल वाले बाहर दो चार ही ट्रेलर लगा कर रखते थे ....हमारे देखने के लिए उतने ही काफी थे.....हम पांच दस मिनट उन को अच्छे से देख कर ....मन बना लेते कि यह फिल्म तो देखनी ही है .....फिर ख्याल आता कि शुरु शुरू में तो टिकट कालाबाज़ारी में तो हम ले नहीं पाएंगे ....कोई बात नहीं, थोड़े दिन बाद देख लेंगे ....इतनी भी क्या जल्दी है ....मन को समझाते हुए साईकिल पर सवार हो कर घर पहुंच जाते ....लेकिन उस फिल्म को देखने की चाहत बराबर बनी रहती और देख भी लेते देर-सवेर......जहां चाह वहां राह...

जिस दिन फिल्म देखने जाते .....उस दिन फिर उन ट्रेलरों को तीन बार निहारा जाता ....

फिल्म शुरू होने से पहले ...... जब टिकट ले कर अंदर चले जाते ...अकसर दस पंद्रह मिनट पहले तो हम उन ट्रेलरों को देखने में ही वक्त बिता देते .....ज़ाहिर सी बात है कि कुछ खास समझ न आती ....लेकिन जल्दी जल्दी में देख लेते ....फिल्म देखने का उत्साह लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा होता ....


 

हां, लिखते लिखते कईं बातें याद आने लगती हैं ....जैसे ही हाल का गेट खुलता ....लोग धक्का-मुक्की कर के कैसे भी अंदर जा पहुंचते और अपने मनपसंद की सीटों पर कब्जा करने की कोशिश करते ...जिन सिनेमा हालों में एसी न होता, वहां पर पंखे के नीचे वाली सीट या दीवार पर लगे पंखे के सामने वाली सीट हथियाने को होड़ सी लग जाती .....

फिल्म के इंटर्वल के वक्त ....फिल्म के इंटर्वल वाला टाईम बड़ा कीमती होता था....वॉश-रूम में जाना ज़रूरी होता था ...पिर एक दो बढ़िया से समोसे, भटूरे-छोले, पूरी-छोले, कुलचे छोले भी रगड़ने होते थे और साथ में तली हुई (फ्राई) नमकीन मूंगफली भी लेनी होती थी ....(इन में से कोई भी एक-दो चीज़ें, सारी नहीं, यार.....इतने तो जेब में पैसे ही नहीं होते थे .... 😂😂😂😂😂😂...और यह सब करने के बाद हम लोग भाग कर सिनेमा हाल के बाहर जो वेटिंग रुम वाला हाल होता था ...जहां पर बीस तीस फिल्मी ट्रेलर लगे होते थे ....अब वह फ्राई मूंगफली को चबाते चबाते उन ट्रेलरों को फिर से निहारा जाता और जो जो दृश्य इंटर्वल से पहले हो चुके होते और जो अभी नहीं फिल्म में नहीं देखे, उन का हिसाब लगा लिया जाता ....बहुत से लोग इस तरह की मगज़मारी कर रहे होते ....उन में से मैं भी एक तो होता ही था....

फिल्म खत्म होने के बाद .....इंटर्वल खत्म होने की घँटी बजते ही सब हाल में भाग जाते ...अगर कोई एक दो मिनट लेट हो जाता तो सीट पर बैठते ही यह ज़रूर पूछता कि कितना समय हो गया है ...लेकिन लोग समझदार थे सभी उन दिनों....बंदे को किसी सदमे से बचाने के लिए उस की साथ वाला सीट उस का यह कह कर ढ़ाढ़स बढ़ा देता कि अभी, अभी एक मिनट भी नहीं हुआ.....मुझे ऐसे लगता है कि उन दिनों फिल्में देखते देखते हमें पेशाब भी बहुत आता था या फिर गब्बर सिंह के कारनामे देख कर ही थोड़ा-बहुत निकल जाता होगा ....याद नहीं वह भी ठीक से ... 😎😎😎😎😎😎😂😂 

जी हां, फिल्म खत्म हो गई ....अब हाल से बाहर निकलते ही उस वेटिंग एरिया में एक बार फिर से जाना होता ...एक क्विक अवलोकन के लिए ...झट से यह आश्वस्त होने के लिए ....कि कुछ रह तो नहीं गया....अगर कोई एक दो ट्रेलर ऐसे होते जो अंदर फिल्म में नहीं दिखे होते तो लोग उस वक्त थोड़ा नाराज़ सा हो जाते कि देखो, फिल्म काटी हुई है ...यह सीन भी न था, वह भी न था .........इतने में कोई याद दिला देता कि यार, यह तो था ही, तुझे याद नहीं .....

खैर, तभी गेट कीपर की सीटी या आवाज़ आ जाती कि खाली करो भाई हाल को ......जल्दी करो .....

फिल्में भी हमारी पीड़ी की ज़िंदगी का एक बहुत ही ज्‍यादा अहम् हिस्सा रही हैं .....हमें याद है कौन सी फिल्म हमने किस के साथ किस शहर में किस के साथ देखी थी ....अभी भी वे गीत कभी गीत बजते हैं ....तो पुरानी यादें हरी भरी हो जाती हैं....मुझे तो अपने सिरदर्द का इलाज यही ठीक लगता है कि जब भी सिर भारी होता है मैं अपने दौर के गाने सुनने लगता हूं यू-टयूब पर ....या रेडियो पर विविध भारती लगा लेता हूं ....और जब हो सके तो टहलने चला जाता हूं ...बस, सिर दर्द ठीक .....कईं बार डिस्प्रिन लेनी ही पड़ती है जैसे कि आज सुबह ...वह भी एक अजीब किस्सा है ....

थोड़ा थोड़ा सिर दर्द था कल ...कुछ ऐसा ही खा लिया था ....रात में लगा कि चलो, प्राईम-वीडियो पर कोई पुरानी फिल्म लगा लेता हूं ...दीवार फिल्म लगा तो ली ...लेिकन पांच दस मिनट से ज़्यादा नहीं देखी गई....बंद कर के सो गया....थोड़ा थोड़ा सिर दर्द था ही, सुबह उठ कर डिस्प्रिन लेकर ही तबीयत कायम हुई ......कईं बार ...कईं बार क्या, बहुत बार पुरानी फिल्में देखना भी नहीं भाता .....सुपर डुपर िहट रही हैं तो रहा करें.....दिल का क्या करें, नहीं इच्छा तो नहीं इच्छा, इस के साथ कोई ज़ोर-जबरदस्ती तो नहीं....यू-ट्यूब पर भी मैं जब अपने ज़माने के गीत सुनता हूं तो वीडियो देखने में मेरी कोई खास रूचि नहीं होती....मुझे बस गाना सुनने से ही मतलब होता है ...

लेिकन कभी कोई गीत स्पैशल होता है कुछ अलग वजह से ....तो उस का वीडियो तो बार बार देखना ही होता है ....होली के दिन मैं न तो किसी को रंग लगाता हूं ... न ही किसी को डिस्टर्ब करता हूं और न ही मैं कोई डिस्टर्बैंस चाहता हूं ....बस, होली के गीत सुन कर होली मन जाता है, पुराने दिनों की होली की यादों के खेलते खेलते ही होली हो जाती है .....इस बार भी जब मैं होली के दिन यू-ट्यूब पर गीत सुन रहा था तो होली के गीत लिख कर सर्च किया तो एक गाना आ गया ...फिल्म आपबीती का ...मुझे नहीं याद कितने सालों के बाद मैंने यह गीत सुना था ...मुझे याद आ गया कि आज से कोई पचास साल पहले ....१९७६ में अपनी मां के साथ अमृतसर के एनम थिएटर में मैंने यह फिल्म देखी थी ....बस, फिर क्या था, होली के दिन से लेकर अब तक उसे कईं बार सुन चुका हूं....नीला..पीला..हरा..गुलाबी ...कच्चा पक्का रंग .... 😂😂....इस लिंक पर क्लिक कर के आप इसे सुन सकते है ं....सुनिए आपबीती का यह गीत ...

और हां, ट्रेलर भी तो आप को दिखा दिए हैं.....ये मेरी कलेक्शन से हैं....बेशकीमती कलेक्शन ...😂😂 कुछ अरसा पहले ही हासिल हुए हैं मुझे बड़ी मु्श्किल से ....मैंने भी बहुत बहुत लंबे अरसे बाद इन का दर्शन किया जब ये मुझे ऑन-लाइन मिल गए.......(वैसे मैंने यह फिल्म नहीं देखी, जहां तक मुझे याद है ..)